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..न इलाज मिला और न एंबुलेंस, तमाशबीनों के बीच से बैलगाड़ी पर निकली गरीब किसान की अंतिम यात्रा

बांदा के ओरन कस्बे में देर तक एंबुलेंस का इंतजार करने के बाद बैलगाड़ी से किसान पिता का शव ले जाता युवक।

समरनीति न्यूज, बांदाः गरीब की लाचार जिंदगी से जुड़ीं तमाम तंगहालियां न उसे इज्जत से जीने देती हैं और न मरने। रही बात सरकार और सहूलियतों की तो  न जिंदा रहते काम आती हैं और न मरने के बाद। गरीबों की जिंदगी की इस कड़वी सच्चाई में रूबरू होना चाहें तो बस बुंदेलखंड चले आइये। यहां गरीब और किसान किस तरह तिल-तिलकर मरते हैं, हकीकत आपको करीब से देखने को मिलेगी।

इलाज कराने पहुंचे किसान ने तोड़ा दम, शव के पास तमाशबीन बने रहे लोग  

ऐसा ही एक घटनाक्रम मंगलवार को बुंदेलखंड में बांदा जिले के ओरन कस्बे में घटित हुआ। जहां बदौसा के ओरहवन गांव का रहने वाला एक गरीब किसान आशाराम (65) बीमारी का इलाज कराने ओरन कस्बा आया था।

किसान के साथ उनका बेटा विनोद भी था। इससे पहले ही गरीब किसान को इलाज मिल पाता, वह बबेरू रोड पर पुरानी पुलिस चौकी के पास अचानक गश खाकर गिर पड़े। मुंह से खून बहने लगा और तड़पते हुए कुछ देर बाद दम तोड़ दिया।

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साथ आए अकेले बेटे ने पिता को संभालने की पूरी कोशिश की। लोगों की ओर मदद के लिए टकटकी लगाकर भी देखा। लेकिन न मदद को कोई हाथ बढ़ा और न ही गरीब को समय पर इलाज मिला।

लाचार बेटा शव को वहीं छोड़कर किसी तरह एक कपड़ा लाया और पिता के शव को ढक दिया। बेटे की आंखों से आंसू गिरते रहे। फिर भी वह अपना फर्ज अदा करता रहा।

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बहरहाल, आशाराम दुनिया छोड़कर जा चुके थे और उनका शरीर वहीं सड़क के किनारे पड़ा था। एक भले इंसान ने फोन से एंबुलेंस 108 को काल कर दी। अब बेटे को इंतजार था कि सरकारी एंबुलेंस आएगी और उसके पिता के शव को घर तक पहुंचा देगी। इंतजार चलता रहा।

बांदा के ओरन कस्बे में बीमारी से मौत के बाद सड़क किनारे पड़ा गरीब किसान का शव।

..जब दरोगा जी ने पहुंचकर दौड़ाईं नजरें

आसपास के लोगों ने बताया कि सूचना पाकर पास की चौकी के दरोगा जी भी वहां पहुंच गए। किसान के शव के पास खड़े होकर दरोगा जी शक भरी नजरें दौड़ाते रहे।कभी शव को देखते तो कभी आसपास के लोगों को। लेकिन मजाल कि अपनी वर्दी के रुतबे को कम करके इंसानियत के नाते ही सही, शव को घर पहुंचाने की व्यवस्था ही करा देते।

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दरोगा जी थो़ड़ी देर बाद निकल लिए और एंबुलेंस का इंतजार जारी रहा। काफी देर शव को पान की पीकों वाली गंदी जगह पर पड़ा देख किसान के बेटे का सब्र जबाव दे गया। उसने खुद ही किसी तरह बैलगाड़ी का इंतजाम किया और शव को उसपर रखकर अपने घर को चल पड़ा।

इस पूरे घटनाक्रम ने चंद ही मिनटों में सारे सरकारी दावों की पोल खोल दी। साथ ही लोगों की मर चुकीं मानवीय संवेदनाओं की तस्वीर भी उजागर कर दी।सरकारी व्यवस्था के कागजीं आंकड़ें कुछ भी कहें लेकिन हकीकत यही है कि बुंदेलखंड में सरकारी एंबुलेंस कम ही जरूरत के वक्त आती हैं।

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वहीं अस्पताल में सराकरी दवाओं का टोटा है और डाक्टर अस्पतालों से ज्यादा प्राइवेट दुकानों पर दवा के साथ जमीर बेचते दिखाई दे जाते हैं। मरने वाले आशाराम दो बेटों के पिता थे और आठ बीघे के कास्तकार। बुंदेलखंड को करीब से जानने वाले लोग समझ सकते हैं कि यहां आठ बीघा के कास्तकार की जिंदगी किन परेशानियों में गुजरती है। गरीबी कैसे नासूर बनकर कर्ज और भुखमरी की शक्ल में उनको जीते-जी मार डालती है।

 

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