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बुंदेलखंड में होता है महिलाओं का अनोखा दंगल, जहां घूंघट वालियां दिखाती हैं कुश्ती में दम-खम

बुंदेलखंड के हमीरपुर में महिलाओं के दंगल में एक-दूसरे को पटखनी देने की कोशिश करतीं महिलाएं।

समरनीति  स्पेशलः  बुंदेलखंड के हमीरपुर जिले के मुस्करा थाना के गांव लोदीपुर निवादा में कजलिया पर्व पर महिलाओं के दंगल मे घूंघटवाली बहुओं ने तरह-तरह के दांव पेंच दिखाए जाते हैं। कहीं सास पर बहू भारी पड़ती है तो कहीं सास ने बहू को पटखनी लगाकर चारों खाने चित्त कर दिया।

सास से बहू, ननद से भौजाई और देवरानी-जेठानी के बीच होती है भिडंत 

ननद-भौजाइयों के बीच हुई भिडंत में कहीं ननद का पलड़ा भारी रहता है तो कहीं भौजाइयां बाजी मार ले जाती है। घूंघट में लिपटीं देवरानियां-जेठानियां भी किसी से कम नहीं रहतीं। कई देवरानियां जेठानियों को धूल चटाती हैं तो कई जेठानियां अपनी देवरानियों को चारों खाने चित्त कर डालती हैं।

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दंगल में बुआ और मौसियां भी अपने-अपने करतब दिखाती हैं। ज्यादातर मौसी बुअाओं पर भारी पड़ती हैं। महिलाों में कोई तंगड़ी दांव लगाती हैं तो कोई कैची दांव चलाकर प्रतिद्वंदी को धूल चटाती हैं।

पुरूषों को नहीं फटकने देतीं दंगल के आसपास 

महिलाओं के इस दंगल मे किसी भी पुरूष को दंगल के आसपास भी नहीं फटकने दिया गया। मर्दों को आधा किमी दूर रखा गया। यहां तक कि दंगल संचालन समिति के सदस्य शैलेन्द्र सिंह को भी अखाड़े से बाहर कर दिया गया। अखाड़े के चारों तरफ लाठी-डंडा से लैस महिलाएं मर्दों पर नजर रखे रहीं।

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अखाड़े में कुश्तियों के दौरान बुजुर्ग महिलाएं ढोल बजाती रहती हैं। संचालन समिति की सदस्य लछ्मी,गुड़िया और मालती शुक्ला ने बताती हैं कि आसपास के करीब एक दर्जन गांवों की महिलाओं को हर साल आमंत्रित किया जादा है। उनके आने पर सबकी इंट्री की जाती है।

बुंदेलखंड के हमीरपुर में महिलाओं के दंगल में एक-दूसरे को पटखनी देने की कोशिश करतीं महिलाएं।

दंगल संचालन समिति की सदस्य मालती शुक्ला बताती हैं कि घूंघटवाली बहुओं समेत तकरीबन 50 महिलाओं ने अखाड़े में कुश्ती दिखाती हैं। इस बार भी सियादुलारी लीलावती,  गुड़िया, लछ्मी, रागिनी, आराधना आदि की कुश्तियां सबसे रोचक रही थीं। घूंघट वाली बहुओं की कुश्तियों में जमकर तालियां बजीं।

ब्रिटिश काल से चल रही है महिलाओं के दंगल की यह अनोखी परंपरा 

लोदीपुर निवादा गांव के जगदीश चंद्र जोशी, रामकिशोर सिंह, रतन सिंह, करन सिंह, संतोष शुक्ला आदि लोग बताते हैं कि ब्रिटिश पीरिएड में अंग्रजों ने उनके गांव में बहुत अत्याचार किया था। महिलाओं को सबसे ज्यादा प्रताड़ित किया गया था।

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पुरुषों की गैर मौजूदगी में महिलाएं अपनी सुरक्षा कर सकें, इसके लिए महिलाओं को कुश्ती कला के दाव -पेंच सिखाए गए थे। तबसे दंगल का आयोजन करके महिलाएं एक-दूसरे से कुश्ती के दांव-पेंच सीखती हैं। बताया जाता है कि कजली पर्व पर हम सब गांव वाले अपनी इसी पुरानी परंपरा को आज भी निभाते चले जा रहे हैं।

 

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